१५-अगस्त
आज़ादी भी कितनी बड़ी नेमत है !
आज बाहर की दुन्या तो बड़ी हसीन है , खुशगवार है , रोमानी है , रंग बिरंगी है , हवाओं में ताज़गी सी है ...
मगर ऍ काश ...
हमारे अन्दर का मौसम भी दिलरुबा होता , उतना ही महकता होता ...
आज मिटटी का रंग भी बड़ा लाल लाल सा नज़र आता है , रूह कहती है के यह मिटटी उन जियालों के खून की याद में रो रही है जिन्हों ने इस प्यारे वतन को आजाद कराया , अपने क़ीमती खून की क़ुर्बानियाँ दीं , शाएद सोचा होगा के उनके मरने के बाद ही सही मगर एक नई सुबह तो तुलू होगी !
आह ... के वह सुबह तुलू हुयी भी तो कितने मुख्तसर वक़्फ़े के लिए?
प्यारे वतन की धरती का रंग आज भी उतना ही लाल है।
मज़हब , सियासत , जुबां , इलाका , ज़ात पात और फ़िरक़े ... इन सब मोतियौं को जमा कर के खूबसूरत जगमगाती माला बनायी थी मोमारान-ऐ-वतन ने। मालूम नहीं इतने सालों में किस की नज़र लग गई ?
तस्बीह की डोर टूट गई है , दाने इधर उधर बिखर गए हैं ...
रोने की आवाजें , दहशत ज़दा आवाजें , धमाकों की आवाजें , चीखना चिल्लाना , तड़पना फड़कना , फ़िज़ा में बारूद की बू ... परिंदे उदास हैं , उनकी चोंच से शाक़-ऐ-जैतून छीन ली गई है ।
फिर भी ...
हां फिर भी ... हर साल १५-अगस्त की सुबह माहौल बदल जाता है , हसीं-वो-खुशगवार हो जाता है , चारों तरफ़ जैसे होली के दमकते रंग बिखर जाते हैं , आज़ादी के दिल-आवीज़ नग़्मों की लहरें सुनाई देती हैं , फिजायें झूम झूम उठती हैं ...
ऍ अल्लाह ! ऍ मेरे रब !
काश के यह दिन , यह खूबसूरत दिन , सारे साल पर फैल जाए , हम नेमत-ऐ-आज़ादी की हक़ीक़त को जान लें पहचान लें , इसकी हिफ़ाज़त हम सब ने मिलकर करनी है .... आपस में इन्ही मोहब्बतों , चाहतों , रिश्तों नातों को परवान चढ़ाना है जिसकी ख़ातिर हम ने आज़ादी जैसी यह नेमत हासिल की थी ...
काश के यह बात हम सब की समझ में आ जाए ... काश के .....
ऍ ख़ुदा ! ढलकते हुए एक आंसू की इस दुआ को क़बूल फरमा ले ... आमीन !!
अपने प्यारे वतन हिन्दुस्तान के तमाम देश वासियौं को ...
A happy Independance day !!
तुलू = rise
मुख्तसर वक़्फ़े = a short time
मोमारान-ऐ-वतन = वतन को बनाने वाले
शाक़-ऐ-जैतून = a branch of olive (for peace)
दिल-आवीज़ = दिल को छूने वाले
परवान चढ़ाना = to grow positively