मंगलवार, 30 दिसंबर 2008


ग़ज़ा पर इसराइल के हमले : हमारा अह्तेजाज !!



ग़ज़ा पर इसराइल के वहशियाना हमले
हमारा अह्तेजाज
हर इंसानियत-पसंद का अह्तेजाज !!

Where is Human Rights?
Is this what you call : Road to Peace??
UNO = United Nonsense !!

8 टिप्‍पणियां:

संजय बेंगाणी ने कहा…

जब इजराइल पर हमला होता है तब इंसानियत पसन्द लोगो का अह्तेजाज कहाँ जाता है?

Suresh Chiplunkar ने कहा…

भाई साहब, ज़रा कश्मीर-असम पर भी निगाह डाल लेते… घर तो फ़ुँका पड़ा है, दूसरे के यहाँ पानी भरी बालटी लेकर दौड़ने का क्या मतलब? सारी की सारी इंसानियत फ़िलीस्तीन के लिये ही रख छोड़ी है या कश्मीरी पंडितों के लिये भी कुछ बचा रखी है?

राज भाटिय़ा ने कहा…

अब हम क्या कहे???

Hyderabadi ने कहा…

संजय बेंगाणी...
इसराइल पर हमला ?? क्यूँ मज़ाक़ करते हैं भाई!
वह भूके नंगे बे-घर फ़लस्तीनी .... जूते , चप्पल , कंकर पत्थर से हमला करते हैं या बम मिज़ाएल से??
और अगर वह बम से हमला करते भी हैं तो वह reaction है action नही है.
अब आप यह बताईये के निहत्ते लोगों पर किसी हुकूमत का हमला करना UNO के किस क़ानून में लिखा हुआ है?

राज भाटिय़ा...
भाटिय़ा जी , आम आदमी पर बिला-वजह का हमला कहीं भी क्यूँ ना हो, चाहे मुंबई में हो, चाहे कश्मीर में, चाहे इसराइल या चाहे फलस्तीन में .... यह दहशतगर्दी ही है , जिस के ख़िलाफ़ हर इन्साफ-पसंद इंसान को आवाज़ उठाना चाहिए.

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` ने कहा…

ये बतायेँ कि रोकेट से एक दूसरे के घरोँ पर बमबारी कब रुकेगी ?

मुँबई शहर पर,
देहली सचिवालय पर
खुलेआम हमला करना,
ट्रेनोँ मेँ बम रखकर
निर्दोष नागरोकोँ को
मौत देना भी कब तक चलता रहेगा ?
ईज़राइल के सारे लोग खत्म हो जायेँगेँ तब ?
या भारत के सब मर जायेँगेँ तब ?
अमन चैन क्या सिर्फ ईस्लाम को बख्शा गया है ?
- लावण्या

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` ने कहा…

आप मुँबई मेँ हुए हमले के बारे मेँ भी तो लिखिये --
दोनोँ तरफ जो भी नाइन्साफी हुई है उसे बताना और देखना जरुरी है --
Dp you agree to Peace or not ?
लडाई को रोकने से ही जिन निर्दोष लोगोँ का रोना हम और आप रो रहे हैँ , कुछ मायने रखता है
अन्यथा जिनके रस पे खून सवार है वे बमबारी, बँदूक से और लोगोँ को मारते ही रहेँगेँ -
कैसे रोका जाये इसे ???
उस पर आप के क्या विचार हैँ ?
- लावण्या

Hyderabadi ने कहा…

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` ...
लावण्य जी , क्या सच मच आप occupied और occupier को compare करना चाहती हैं?
Imagine about people who have been occupied, oppressed, rubbished, smeared and dehumanised for more than 40 years, whose country has been literally wiped off the face of map, who have no life to dream of, no wishes to wish for and these are the people who terrorise the poor Zionist state. 400+ [to date] people have to die for the less than 20 people killed for over a decade. And what is happening? the UN and France and Russia and other so-called members of the international community [alias for power group] call for an "end to the offensives FROM BOTH SIDES", as if both sides have any kind of parallels, as if they are equal powers fighting over a petty issue, as if there is no difference between the occupier and the occupied, oppressor and the oppressed, murderer and the murdered.

Hyderabadi ने कहा…

लावण्य जी ,
ईज़राइल के topic से हट कर कुछ दूसरी बातें ...
मैं शायद कई बार अपने इस ब्लॉग पर लिख चुका हूँ के :
आतंक-वादी का कोई मज़हब नही होता. आतंक फैलाने वाला मुसलमान भी हो सकता है, हिंदू, सिख, ईसाई, यहूदी भी.
इसलिए terrorism पर discuss करना हो तो मज़हब को बीच में नही लाना चाहिए क्यूँ के दुन्या का कोई भी मज़हब आतंक फैलाने का दरस नही देता. even क़ुरान में लिखा है के:
जिस ने एक इंसान को क़त्ल किया उसने सारी इंसानियत को क़त्ल किया. (Quran-5:32)
लावण्य जी, इस्लाम का मतलब ही PEACE है!
हाँ कुछ मुसलमान हैं जो इस्लाम को सही तरह नही जानते और जानते भी हूँ तो शायद इस्लाम के सही रास्ते से भटक गए हैं, इसी लिए तो हज के मोक़े पर इमाम साहब ने जो नसीहत की थी उसे मैं ने यहाँ लिखा है.