मंगलवार, 16 दिसंबर 2008


हम ने तो कोई बात निकाली नही ग़म की


सीने में जलन आंखों में तूफ़ान सा क्यूँ है
इस शेहर में हर शख़्स परेशान सा क्यूँ है

दिल है तो धड़कने का बहाना कोई ढूंडे
पत्थर की तरह बे-हिस-व-बेजान सा क्यूँ है

तन्हाई की यह कौनसी मंज़िल है रफ़ीक़ो
ता हददे-नज़र एक बयाबान सा क्यूँ है

हम ने तो कोई बात निकाली नही ग़म की
वह ज़ूद-ऐ-पशीमान , पशीमान सा क्यूँ है

क्या कोई नई बात नज़र आती है हम में
आइना हमें देख के हैरान सा क्यूँ है

poet = प्रोफ़ेसर शहरयार


रफ़ीक़ो = दोस्तो
ता हददे-नज़र = नज़र की last-limit तक
बयाबान = जंगल
ज़ूद-ऐ-पशीमान = शर्मिंदगी का मारा

6 टिप्‍पणियां:

seema gupta ने कहा…

तन्हाई की यह कौनसी मंज़िल है रफ़ीक़ो
ता हददे-नज़र एक बयाबान सा क्यूँ है
"बेहतरीन ग़ज़ल, आज फ़िर से पढना अच्छा लगा"
Regards

विनय ने कहा…

बहुत बढ़िया!

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चाँद, बादल और शाम
http://prajapativinay.blogspot.com/

अशोक मधुप ने कहा…

क्या कोई नई बात नज़र आती है हम में
आइना हमें देख के हैरान सा क्यूँ है
बहुत अच्छा शेर! बधाई

राज भाटिय़ा ने कहा…

क्या कोई नई बात नज़र आती है हम में
आइना हमें देख के हैरान सा क्यूँ है

बाताँ नहीं करते हम हैदराबादी....
भाई आप की भाषा हमे बहुत प्यारी लगती है.
धन्यवाद

Hyderabadi ने कहा…

seema gupta...
आप की तरह मुझे भी शहरयार की यह ग़ज़ल बहुत पसंद है. आप का शुक्रिया के आप ने ब्लॉग को विज़िट किया और अपनी राए दी.

विनय और अशोक मधुप...
पसंद करने का बहुत शुक्रिया.

राज भाटिय़ा...
भाटिय़ा जी, बहुत शुक्रिया. और सच पूछें तो समाजी मसलों और इंसानी psychology पर आप जो कुछ लिखते हैं वह मुझे बहुत मुतास्सिर करता है. अल्लाह आप को अच्छा रखे और आप के तजुर्बों से हमें फ़ाएदा पहुंचाए, अमीन

bsc ने कहा…

bahut khoob
mujhay accchi hindi nahin aati laikin ghazal ka maza agiya
link Ajmal bhopal saheb say liya