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रविवार, 28 जून 2009


अमावस की रात



शाम होते ही सितारे और हम
एक ही चीज़ को ढूंढते हैं हम

दोनों के चहरे पर उदासी है
एक सा लगता है दोनों का ग़म

वह तो हैं आसमान में सरगर्दां
और सफ़र करते हैं ख़याल में हम

तारों के साथ बहुत तारे हैं
हम सफ़र में हैं अकेले एकदम

चाँद के हैं तलाश में तारे
और चंदा को ढूंढते हैं हम

चाँद को पा के थम गए तारे
पर मेरी फ़िक्र जाए कैसे थम

तारों के चहरे पर ख़ुशी लौटी
आँख नय्यर की रहेगी पुर नम

poet = फ़हीम नय्यर

गुरुवार, 14 मई 2009


जिस रात के ख्वाब आये


काफ़ी दिन बाद ब्लॉग पर हाज़री दे रहा हूँ ... एक ऐसी खूबसूरत ग़ज़ल के साथ जिसके शाएर का नाम मुझे मालूम नहीं है.
अर्ज़ किया है ...........




जिस रात के ख्वाब आये , वह ख्वाबों की रात आई
शर्मा के झुकी नज़रें , होंटों पे वह बात आई

पैग़ाम बहारों का आखिर मेरे नाम आया
फूलों ने दुआएं दीं , तारों का सलाम आया
आप आये तो महफ़िल में नग़्मों की बरात आई
जिस रात के ख्वाब आये , वह ख्वाबों की रात आई

यह महकी हुयी जुल्फें , यह बहकी हुयी सांसें
नींदों को चुरा लेंगी यह नींद भरी आँखें
तक़दीर मेरी जागी , जन्नत मेरे हाथ आई
जिस रात के ख्वाब आये , वह ख्वाबों की रात आई

चहरे पे तबस्सुम ने एक नूर सा छलकाया
क्या काम चरागों का जब चाँद निकल आया
लो आज दुल्हन बन के पहलु में हयात आई
जिस रात के ख्वाब आये , वह ख्वाबों की रात आई
शर्मा के झुकी नज़रें , होंटों पे वह बात आई

रविवार, 22 फ़रवरी 2009


मेरी चाहत की बहुत लम्बी सज़ा दो मुझ को


इस ग़ज़ल की video देखें : यहाँ

मेरी चाहत की बहुत लम्बी सज़ा दो मुझ को
कर्ब-ऐ-तन्हाई में जीने की सज़ा दो मुझ को

फ़न तुम्हारा तो किसी और से मंसूब हुआ
कोई मेरी ही ग़ज़ल आके सूना दो मुझ को

हाल बे-हाल है, तारीक है मुस्तक़बिल भी
बन पड़े तुम से तो माज़ी मेरा ला दो मुझ को

आख़री शमा हूँ मैं बज़्म-ऐ-वफ़ा की लोगो
चाहे जलने दो मुझे, चाहे बुझा दो मुझ को

ख़ुद को रख कर मैं कहीं भूल गई हूँ शाएद
तुम मेरी ज़ात से एक बार मिला दो मुझ को

poetess : निकहत इफ़्तेख़ार

कर्ब-ऐ-तन्हाई = तन्हाई का दर्द
फ़न = art / poetry
मंसूब = attached
तारीक = dark
मुस्तक़बिल = future
माज़ी = past
बज़्म-ऐ-वफ़ा = वफ़ा की महफ़िल

मंगलवार, 16 दिसंबर 2008


हम ने तो कोई बात निकाली नही ग़म की


सीने में जलन आंखों में तूफ़ान सा क्यूँ है
इस शेहर में हर शख़्स परेशान सा क्यूँ है

दिल है तो धड़कने का बहाना कोई ढूंडे
पत्थर की तरह बे-हिस-व-बेजान सा क्यूँ है

तन्हाई की यह कौनसी मंज़िल है रफ़ीक़ो
ता हददे-नज़र एक बयाबान सा क्यूँ है

हम ने तो कोई बात निकाली नही ग़म की
वह ज़ूद-ऐ-पशीमान , पशीमान सा क्यूँ है

क्या कोई नई बात नज़र आती है हम में
आइना हमें देख के हैरान सा क्यूँ है

poet = प्रोफ़ेसर शहरयार


रफ़ीक़ो = दोस्तो
ता हददे-नज़र = नज़र की last-limit तक
बयाबान = जंगल
ज़ूद-ऐ-पशीमान = शर्मिंदगी का मारा

बुधवार, 26 नवंबर 2008


मोहब्बत मर नही सकती ...


हज़ारों दुःख पड़ें सहना , मोहब्बत मर नही सकती
है तुम से बस यही कहना , मोहब्बत मर नही सकती

तेरा हर बार मेरे ख़त को पढ़ना और रो देना
मेरा हर बार लिख देना , मोहब्बत मर नही सकती

किया था हम ने कैम्पस की नदी पर एक हसीं वादा
भले हम को पड़े मरना , मोहब्बत मर नही सकती

जहाँ में जब तलक पंछी चहकते उड़ते फिरते हैं
है जब तक फूल का खिलना , मोहब्बत मर नही सकती

पुराने अहद को जब जिंदा करने का ख़्याल आए
मुझे बस इतना लिख देना , मोहब्बत मर नही सकती

वह तेरा हिज्र की शब् , फ़ोन रखने से ज़रा पहले
बहुत रोते हुए कहना , मोहब्बत मर नही सकती

अगर हम हसरतों की क़ब्र में ही दफ़न हो जाएँ
तो यह कुत्बों पे लिख देना , मोहब्बत मर नही सकती

पुराने राब्तों को फिर नऐ वादे की खाहिश है
ज़रा एक बार तो कहना , मोहब्बत मर नही सकती

गए लम्हात फ़ुर्सत के , कहाँ से ढूंढ कर लाऊँ
वह पहरों हाथ पर लिखना , मोहब्बत मर नही सकती

poet = वसी शाह

शनिवार, 15 नवंबर 2008


आदिल मंसूरी - Adil Mansuri


गुजराती और उर्दू के ग़ज़ल-लेखक और मुसव्विर जनाब आदिल मंसूरी 6-नवम्बर-2008 को वफ़ात पा गए. अल्लाह उनको जन्नत नसीब फ़रमाए, अमिन.
links :
Adil Mansuri dot com
आदिल मंसूरी की गुजराती ग़ज़लें
adil mansuri, death of a poet

आदिल मंसूरी की एक ग़ज़ल

कल फूल के महकने की आवाज़ जब सुनी
परबत का सीना चीर के नदी उछल पड़ी

मुझ को अकेला छोड़ के तू तो चली गई
महसूस हो रही है मुझे अब मेरी कमी

कुर्सी, पलंग, मेज़, क़ल्म और चांदनी
तेरे बग़ैर रात हर एक शय उदास थी

सूरज के इन्तेक़ाम की ख़ूनी तरंग में
यह सुबह जाने कितने सितारों को खा गई

आती हैं उसको देखने मौजें कुशां कुशां
साहिल पे बाल खोले नहाती है चांदनी

दरया की तह में शीश नगर है बसा हुआ
रहती है इसमे एक धनक-रंग जल परी

बुधवार, 12 नवंबर 2008


कभी चाँद चमका ग़लत वक्त पर


कहीं छत थी दीवार-ओ-दर थे कहीं
मिला मुझको घर का पता देर से
दिया तो बहुत ज़िंदगी ने मुझे
मगर जो दिया, वह दिया देर से

हुआ ना कोई काम मामूल से
गुज़ारे शब्-ओ-रोज़ कुछ इस तरह
कभी चाँद चमका ग़लत वक्त पर
कभी घर में सूरज उगा देर से

कभी रुक गए राह में बे-सबब
कभी वक्त से पहले घर आई शब्
हुए बंद दरवाज़े खुल खुल के सब
जहाँ भी गया, मैं गया देर से

यह सब इत्तेफ़ाक़ात का खेल है
यही है जुदाई यही मेल है
मैं मुड़ मुड़ के देखा किया दूर तक
बनी वह ख़ामोशी सदा देर से

सजा दिन भी रौशन हुयी रात भी
भरे जाम लहराई बरसात भी
रहे साथ कुछ ऐसे हालात भी
जो होना था जल्दी, हुआ देर से

भटकती रही यूँही हर बंदगी
मिली ना कहीं से कोई रौशनी
छुपा था कहीं भीड़ में आदमी
हुआ मुझ में रौशन ख़ुदा देर से

poet = निदा फ़ाज़ली

सोमवार, 15 सितंबर 2008


आप की याद आती रही ...


मक़्दूम मोहिउद्दीन की एक मशहूर ग़ज़ल पेश-ऐ-खिदमत है

आप की याद आती रही रात भर
चश्म-ऐ-नम मुस्कुराती रही रात भर

रात भर दर्द की शमा जलती रही
ग़म की लौ थरथराती रही रात भर

बांसुरी की सुरेली सुहानी सदा
याद बन बन के आती रही रात भर

याद के चाँद दिल में उतरते रहे
चांदनी जगमगाती रही रात भर

कोई दीवाना गलियों में फिरता रहा
कोई आवाज़ आती रही रात भर


चश्म-ऐ-नम = आंसू भरी आँख

गुरुवार, 4 सितंबर 2008


कुछ दिन तो बसो मेरी आंखों में


कुछ दिन तो बसो मेरी आंखों में
फिर ख़्वाब अगर हो जाओ तो क्या

कोई रंग तो दो मेरे चेहरे को
फिर ज़ख्म अगर महकाओ तो क्या

एक आइना था सो टूट गया
अब ख़ुद से अगर शरमाओ तो क्या

तुम आस बंधाने वाले थे
अब तुम भी हमें ठुकराओ तो क्या

दुन्या भी वही और तुम भी वही
फिर तुम से आस लगाओ तो क्या

मैं तनहा था मैं तनहा हूँ
तुम आओ तो क्या ना आओ तो क्या

जब देखने वाला कोई नहीं
बुझ जाओ तो क्या गह्नाओ तो क्या

एक वहम है यह दुन्या इस में
कुछ खोओ तो क्या और पाओ तो क्या


- ऊबैदुल्लाह अलीम

मंगलवार, 2 सितंबर 2008


मेरे जिस्म मेरी रूह को अच्छा कर दे


इस से पहले के यह दुन्या मुझे रुसवा कर दे
तू मेरे जिस्म मेरी रूह को अच्छा कर दे

यह जो हालत है मेरी मैं ने बनाई है मगर
जैसा तू चाहता है अब मुझे वैसा कर दे

मेरे हर फ़ैस्ले में तेरी रज़ा शामिल हो
जो तेरा हुक्म हो वह मेरा इरादा कर दे

मुझ को वह इल्म सिखा दे जिस से उजाला फैले
मुझ को वह इस्म पढ़ा दे जो मुझे जिंदा कर दे

ज़ाये होने से बचा ले मेरे महबूब मुझे
यह ना हो वक़्त मुझे खेल तमाशा कर दे

मैं मुसाफ़िर हूँ सौ रस्ते मुझे रास आए हैं
मेरी मंजिल को मेरे वास्ते रस्ता कर दे

इस से पहले के यह दुन्या मुझे रुसवा कर दे
तू मेरे जिस्म मेरी रूह को अच्छा कर दे

- अल्लामा इक़बाल

ज़ाये = waste

मंगलवार, 26 अगस्त 2008


उर्दू के मशहूर शाएर फ़राज़ नहीं रहे


जीवन ज़हर भरा सागर , कब तक अमृत घोलेंगे
नींद तो क्या आएगी फ़राज़ , मौत आए तो सो लेंगे

उर्दू के मशहूर पाकिस्तानी शाएर अहमद फ़राज़ कल सोमवार 25-8-2008 की रात इस्लामाबाद में वफ़ात पा गऐ। अल्लाह उन को जन्नत नसीब करे। आमीन।

उर्दू शाएरी का एक बेहतरीन दौर ख़तम हो गया। अब फ़राज़ जी हम को उसी तरह किताबों में मिलें गे जैसा ख़ुद उन्हों ने कहा था :
जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें

फ़राज़ साहेब की यह पूरी ग़ज़ल उनको ख़राज-ऐ-अक़ीदत के तौर पर पेश है .........


अब के हम बिछडे तो शाएद कभी ख़्वाबों में मिलें
जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें


ढूंढ उजडे हुए लोगौं में वफ़ा के मोती
यह ख़ज़ाने तुझे मुमकिन हैं ख़राबों में मिलें

ग़म-ऐ-दुन्या भी ग़म-ऐ-यार में शामिल कर लो
नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें

तू ख़ुदा है ना मेरा इश्क फरिश्तों जैसा
दोनों इंसान हैं तो क्यूँ इतने हिजाबों में मिलें

आज हम दार पे खींचे गऐ जिन बातों पर
क्या अजब कल वह ज़माने को निसाबों में मिलें

अब ना वह मैं हूँ ना तू है ना वह माज़ी है फ़राज़
जैसे दो साये तमन्ना के , सराबों में मिलें

शुक्रवार, 18 जुलाई 2008


क्या यही होती है शाम-ऐ-इन्तेज़ार


कैफ़ भोपाली की एक ख़ूबसूरत ग़ज़ल पेश-ऐ-खिदमत है।।

हाऐ लोगौं की क्रम फ़र्माईयाँ
तोहमतें , बदनामियाँ , रुस्वाईयाँ

जिंदगी शाएद इसी का नाम है
दूरियां , मजबूरियाँ , तन्हाइयाँ

क्या ज़माने में यूँही कटती है रात
करवटें , बे-ताबियाँ , अंगडा़इयाँ

क्या यही होती है शाम-ऐ-इन्तेज़ार
आहटें , घबराहटें , परछाइयाँ

मेरे दिल की धड़कनों में ढ़ल गयीं
चूड़ियाँ , मोसीक़ियाँ , शेह-नाइ-याँ

एक पैकर में सिमट कर रह गयीं
खूबियाँ , ज़ेबाईयाँ , रेए-नाईयाँ

उनसे मिलकर और भी कुछ बढ़ गयीं
उलझनें , फिक्रें , क़यास-आराईयाँ

चंद लफ़्जौं के सिवा कुछ भी नहीं
नेकियाँ , कुर्बानियां , सच्चाईयाँ

कैफ़ , पैदा कर समुन्दर की तरह
वुस-अतें , खा़मूशियाँ , गहराईयाँ

क्रम फ़र्माईयाँ = महेरबानियाँ (plural form)
तोहमत = इल्ज़ाम लगाना
रुस्वाई = बे-इज़्ज़ती
मोसीक़ियाँ = music (plural form)
पैकर = रूप, सूरत
खूबियाँ = अच्छाईयाँ
ज़ेबाईयाँ = elegancy (plural form)
रेए-नाईयाँ = ख़ूबसूरती (plural form)
क़यास-आराईयाँ = ख़याली बातें (plural form)
वुस-अतें = बड़ाई , large (plural form)

मंगलवार, 15 जुलाई 2008


जिसे चाहा नहीं था...


एतेमाद सिद्दिक़ि (Etemaad Siddiqui, اعتماد صدیقی) हैदराबाद के एक बहुत अच्छे शाएर थे। सऊदी अर्ब में अपने जॉब के 20 साल गुज़ारने के बाद वह हैदराबाद लौट गये थे। अभी कुछ साल पहले हैदराबाद में उनका इन्तेक़ाल हो गया। इन्तेक़ाल से साल भर पहले उनकी शाएरी की पहली किताब रिलीज़ (release) हुयी थी , जिसका नाम है : रेत का दरया
रेत का दरया से एक ख़ूबसूरत ग़ज़ल पेश-ऐ-खिदमत है।।


***

जिसे चाहा नहीं था वह मुक़द्दर बन गया अपना
कहाँ बुन्याद रखी थी कहाँ घर बन गया अपना

लिपट कर तुन्द मौजौं से बड़ी आसूदगी पायी
ज़रा साहिल से क्या निकले समुन्दर बन गया अपना

कोई मंज़र हमारी आँख को अब नम नहीं करता
होए क्या हादसे जो दिल ही पत्थर बन गया अपना

हिजूम-ऐ-शेहर में देखा तो हम ही हम नज़र आए
बनाया नक़्श जब उसका तो पैकर बन गया अपना

चले थे एतेमाद आसाऐषों की आर्ज़ु लेकर
ना जाने कौन्सा सेहरा मुक़द्दर बन गया अपना


तुन्द = severe , fierce
मौजौं = waves
आसूदगी = ease, conveniency
हिजूम-ऐ-शेहर = city public, a crowd in a city
नक़्श = arabesque
पैकर = रूप, सूरत
आसाऐषों = easiness, convenience
सेहरा = desert