शुक्रवार, 18 जुलाई 2008


क्या यही होती है शाम-ऐ-इन्तेज़ार


कैफ़ भोपाली की एक ख़ूबसूरत ग़ज़ल पेश-ऐ-खिदमत है।।

हाऐ लोगौं की क्रम फ़र्माईयाँ
तोहमतें , बदनामियाँ , रुस्वाईयाँ

जिंदगी शाएद इसी का नाम है
दूरियां , मजबूरियाँ , तन्हाइयाँ

क्या ज़माने में यूँही कटती है रात
करवटें , बे-ताबियाँ , अंगडा़इयाँ

क्या यही होती है शाम-ऐ-इन्तेज़ार
आहटें , घबराहटें , परछाइयाँ

मेरे दिल की धड़कनों में ढ़ल गयीं
चूड़ियाँ , मोसीक़ियाँ , शेह-नाइ-याँ

एक पैकर में सिमट कर रह गयीं
खूबियाँ , ज़ेबाईयाँ , रेए-नाईयाँ

उनसे मिलकर और भी कुछ बढ़ गयीं
उलझनें , फिक्रें , क़यास-आराईयाँ

चंद लफ़्जौं के सिवा कुछ भी नहीं
नेकियाँ , कुर्बानियां , सच्चाईयाँ

कैफ़ , पैदा कर समुन्दर की तरह
वुस-अतें , खा़मूशियाँ , गहराईयाँ

क्रम फ़र्माईयाँ = महेरबानियाँ (plural form)
तोहमत = इल्ज़ाम लगाना
रुस्वाई = बे-इज़्ज़ती
मोसीक़ियाँ = music (plural form)
पैकर = रूप, सूरत
खूबियाँ = अच्छाईयाँ
ज़ेबाईयाँ = elegancy (plural form)
रेए-नाईयाँ = ख़ूबसूरती (plural form)
क़यास-आराईयाँ = ख़याली बातें (plural form)
वुस-अतें = बड़ाई , large (plural form)

2 टिप्‍पणियां:

Udan Tashtari ने कहा…

वाह, आभार इस प्रस्तुति का.

विनय प्रजापति 'नज़र' ने कहा…

शानदार!