शनिवार, 15 अगस्त 2009


यौम-ऐ-आज़ादी-ऐ-हिंद मुबारक !!



यौम--आज़ादी--हिंद आप तमाम दोस्तों को मुबारक हो !!

सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा
हम बुलबुले हैं इसकी ये गुलसिताँ हमारा ॥

ग़ुर्बत मे हो अगर हम रहता है दिल वतन मे
समझो वहीं हमे भी दिल है जहाँ हमारा ॥

परबत वो सब से ऊंचा हमसाया आसमाँ का
वो संतरी हमारा वो पासबाँ हमारा ॥

गोदी मे खेलती है इसकी हज़ारों नदिया
गुलशन है जिनके दम से रश्क-ए-जनाँ हमारा ॥

ऐ आब ए रौद ए गंगा वो दिन है याद तुझको
उतरा तेरे किनारे जब कारवाँ हमारा ॥

मज़हब नही सिखाता आपस मे बैर रखना
हिन्दी है हम वतन है हिन्दोस्ताँ हमारा ॥

युनान-ओ-मिस्र-ओ-रोमा सब मिट गये जहाँ से
अब तक मगर है बाक़ी नामो-निशान हमारा ॥

कुछ बात है के हस्ती मिटती नही हमारी
सदियो रहा है दुश्मन दौर-ए-ज़माँ हमारा ॥

इक़्बाल! कोइ मेहरम अपना नही जहाँ मे
मालूम क्या किसी को दर्द-ए-निहाँ हमारा ॥

रविवार, 28 जून 2009


अमावस की रात



शाम होते ही सितारे और हम
एक ही चीज़ को ढूंढते हैं हम

दोनों के चहरे पर उदासी है
एक सा लगता है दोनों का ग़म

वह तो हैं आसमान में सरगर्दां
और सफ़र करते हैं ख़याल में हम

तारों के साथ बहुत तारे हैं
हम सफ़र में हैं अकेले एकदम

चाँद के हैं तलाश में तारे
और चंदा को ढूंढते हैं हम

चाँद को पा के थम गए तारे
पर मेरी फ़िक्र जाए कैसे थम

तारों के चहरे पर ख़ुशी लौटी
आँख नय्यर की रहेगी पुर नम

poet = फ़हीम नय्यर

शनिवार, 30 मई 2009


मोटू बच्चों से हमको बचाओ ....



Video-Games में उछलने कूदने वाले और Junk-Food खाने वाले यह आजकल के बच्चे ना स्कूल में दौड़ते हैं और ना ही घर में हिलते डुलते हैं. और अगर इन से कोई चीज़ लाने या बढ़ाने को कहिये तो टस से मस नहीं होते.
आजकल के बच्चे तो अपना स्कूल का bag ही बड़ी मुश्किल से उठाते हैं. अब वही bag जब कोई मोटा ताज़ा बच्चा जो के पहले ही अपना 10 , 20 किलो का चर्बी वाला गोश्त उठाये फिरता है, उठाये तो फिर उस बेचारे का क्या हाल होगा?

एक हम थे के अपने ज़माने में दौड़ कर स्कूल जाया करते थे और अक्सर भाग कर आया करते थे. फिर हर दूसरे दिन मुर्गा भी बनते थे. एक तो भागो दौड़ो और उस पर मुर्गा भी बनो.
जब कोई हमें सौदा लाने को कहता तो बड़े खुश होते के घर की क़ैद से छुटकारा मिला और "ऊपर की कमाई" भी अलग से मिलती. घर से बाज़ार और बाज़ार से घर बड़ा लंबा चक्कर काट कर आते. रास्ते में मोहल्ले के लड़कों से कोई खेल भी खेल लेते.
अब ऐसे हालात में मोटापे की क्या हिम्मत के हमारे करीब भी फटकता?

बचपन में खेलना कूदना उछालना दौड़ना हर बच्चे का हक़ है. लेकिन यह कमबख्त मोटापा उनका हक़ दबा देता है.
हम तो हमेशा दुआ करते हैं के किसी दुश्मन के बच्चे को भी मोटापा नसीब ना हो. दोस्त के बच्चों से तो हमारा ही हाल पतला होता है .... उस मोटू को खिलाने पिलाने गोद में उठाना जो पड़ता है.

अपने तमाम दोस्तों को हमारा मशूरा है के अपने बच्चों को मोटापे की तरफ़ दोस्ती का हाथ बढ़ाने से रोकने की हर तरह कोशिश करें. वरना ....
उन से यह दोस्ती निभायी ना जायेगी
उन से यह बोझ उठाया ना जाएगा !!

शनिवार, 16 मई 2009


बातों से खुश्बू आए ...



* जब लोगों को पता चलता है के ज़िन्दगी क्या है तो यह आधी गुज़र चुकी होती है.

* दूसरों के चराग़ों से रौशनी ढूँढने वाले हमेशा अंधेरों में भटकते रहते हैं.

* लोग tea-bags की तरह होते हैं , जिन्हें जब तक खोलते हुए पानी में ना डाला जाए पता ही नही चलता के इनका असल रंग क्या है ?

* मौत टल नही सकती .... अगर मौत को मोहब्बत की ताक़त से टाला जा सकता तो कभी भी माँ अपनी गोद में तड़पते बच्चे को मरने नहीं देती.

* ज़िन्दगी की ठोकरें बहतरीन शिक्षा होती हैं.

* हम लोगों के मिज़ाज में यह बात शामिल है के अपनी छोटी सी नेकी और दूसरे की ज़रा सी बुराई हमेशा याद रखते हैं.

* अच्छे दोस्त की दोस्ती एक छत की तरह है जो आपको धूप और बारिश से बचाती है.

गुरुवार, 14 मई 2009


जिस रात के ख्वाब आये


काफ़ी दिन बाद ब्लॉग पर हाज़री दे रहा हूँ ... एक ऐसी खूबसूरत ग़ज़ल के साथ जिसके शाएर का नाम मुझे मालूम नहीं है.
अर्ज़ किया है ...........




जिस रात के ख्वाब आये , वह ख्वाबों की रात आई
शर्मा के झुकी नज़रें , होंटों पे वह बात आई

पैग़ाम बहारों का आखिर मेरे नाम आया
फूलों ने दुआएं दीं , तारों का सलाम आया
आप आये तो महफ़िल में नग़्मों की बरात आई
जिस रात के ख्वाब आये , वह ख्वाबों की रात आई

यह महकी हुयी जुल्फें , यह बहकी हुयी सांसें
नींदों को चुरा लेंगी यह नींद भरी आँखें
तक़दीर मेरी जागी , जन्नत मेरे हाथ आई
जिस रात के ख्वाब आये , वह ख्वाबों की रात आई

चहरे पे तबस्सुम ने एक नूर सा छलकाया
क्या काम चरागों का जब चाँद निकल आया
लो आज दुल्हन बन के पहलु में हयात आई
जिस रात के ख्वाब आये , वह ख्वाबों की रात आई
शर्मा के झुकी नज़रें , होंटों पे वह बात आई