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एक दिल का दर्द है के रहा ज़िन्दगी के साथ
एक दिल का चैन था के सदा ढूंढते रहे
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खुदा करे मेरी तरह तेरा किसी पे आए दिल
तू भी जिगर को थाम के कहता फिरे के हाऐ दिल
रोंदो ना मेरी क़ब्र को इस में दबी हैं हसरतें
रखना क़दम संभाल के देखो कुचल ना जाए दिल
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ज़र्फ़ की बात है, काँटों की ख़लिश दिल में लिए
लोग मिलते हैं तरो-ताज़ा गुलाबों की तरह
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फूँक डालूंगा किसी रोज़ मैं दिल की दुन्या
यह तेरा ख़त तो नही है के जला भी न सकूँ
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जला है जिस्म जहाँ दिल भी जल गया होगा
कुरेदते हो जो अब राख जुस्तजू क्या है?
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यह तो मुमकिन ही नही दिल से भुला दूँ तुझको
जान भी जिस्म में आती है तेरे नाम के साथ
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दिल की चोव्खट पे जो एक दीप जला रखा है
तेरे लौट आने का इमकान सजा रखा है
शुक्रवार, 31 अक्टूबर 2008
गुरुवार, 30 अक्टूबर 2008
दीपावली मुबारक - एक ख़ूबसूरत तस्वीर
दीपावली की मुबारकबाद
अंजुमन इस्लाम हाई स्कूल, अहमदाबाद की तालिबात
की तरफ़ से आप तमाम दोस्त अहबाब क़बूल फ़रमाएँ ।।
अंजुमन इस्लाम हाई स्कूल, अहमदाबाद की तालिबात
की तरफ़ से आप तमाम दोस्त अहबाब क़बूल फ़रमाएँ ।।

मंगलवार, 28 अक्टूबर 2008
लाला ! दिवाली है आई !!
तमाम ब्लॉगर साथियों को दिपावली की शुभकामनऎ ।।
(माफ़ी चाहता हूँ के एक दिन देर से मुबारकबाद दे रहा हूँ)
रौशनी के त्यौहार के इस रंगीन मोक़े पर
नज़ीर अकबराबादी
(असल नाम : वली मोहम्मद, born:1735, death:1830)
की एक मशहूर नज़्म "दिवाली" याद आ रही है जो हम ने अपने बचपन में पढ़ी थी। आप भी इस नज़्म के कुछ अशार से मह्ज़ूज़ होईये गा ।।
हर एक मकान में जला फिर दिया दिवाली का
हर एक तरफ़ को उजाला हुआ दिवाली का
सभी के दिल में समाँ भा गया दिवाली का
किसी के दिल को मज़ा ख़ुश लगा दिवाली का
अजब बहार का है दिन बना दिवाली का
जहाँ में यारो, अजब तरह का है यह त्यौहार
किसी ने नक़्द लिया और कोई करे है उधार
खिलोने, कलियों, बताशों का गरम है बाज़ार
हर एक दुकान में चरागौं की हो रही है बहार
सभों को फ़िक्र है जा बजा दिवाली का
मिठायों की दुकानें लगा के हलवाई
पुकारते हैं के : लाला ! दिवाली है आई
बताशे ले कोई , बर्फी किसी ने तुलवाई
खिलोने वालों की उन से ज़्यादा बन आई
गोया उन्ही के वां राज आ गया दिवाली का
(माफ़ी चाहता हूँ के एक दिन देर से मुबारकबाद दे रहा हूँ)
रौशनी के त्यौहार के इस रंगीन मोक़े पर
नज़ीर अकबराबादी
(असल नाम : वली मोहम्मद, born:1735, death:1830)
की एक मशहूर नज़्म "दिवाली" याद आ रही है जो हम ने अपने बचपन में पढ़ी थी। आप भी इस नज़्म के कुछ अशार से मह्ज़ूज़ होईये गा ।।
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हर एक मकान में जला फिर दिया दिवाली का
हर एक तरफ़ को उजाला हुआ दिवाली का
सभी के दिल में समाँ भा गया दिवाली का
किसी के दिल को मज़ा ख़ुश लगा दिवाली का
अजब बहार का है दिन बना दिवाली का
जहाँ में यारो, अजब तरह का है यह त्यौहार
किसी ने नक़्द लिया और कोई करे है उधार
खिलोने, कलियों, बताशों का गरम है बाज़ार
हर एक दुकान में चरागौं की हो रही है बहार
सभों को फ़िक्र है जा बजा दिवाली का
मिठायों की दुकानें लगा के हलवाई
पुकारते हैं के : लाला ! दिवाली है आई
बताशे ले कोई , बर्फी किसी ने तुलवाई
खिलोने वालों की उन से ज़्यादा बन आई
गोया उन्ही के वां राज आ गया दिवाली का
गुरुवार, 23 अक्टूबर 2008
माँ - कोई तुझ सा कहाँ ?!
मौत की आगो़श में जब थक के सो जाती है माँ
तब कहीं जाकर थोड़ा सुकूं पाती है माँ
रूह के रिश्तों की यह गहराइयां तो देखिये
चोट लगती है हमारे और चिल्लाती है माँ
प्यार कहते हैं किसे और मामता क्या चीज़ है?
कोई उन बच्चों से पूछे जिनकी मर जाती है माँ
जिंदगानी के सफ़र में , गर्दिशों की धूप में
जब कोई साया नही मिलता तो याद आती है माँ
कब ज़रूरत हो मेरी बच्चे को , इतना सोच कर
जागती रहती हैं आँखें और सो जाती है माँ
भूक से मजबूर हो कर मेहमां के सामने
मांगते हैं बच्चे जब रोटी तो शर्माती है माँ
जब खिलोने को मचलता है कोई गोर्बत का फूल
आंसूओं के साज़ पर बच्चे को बहलाती है माँ
लौट कर वापस सफ़र से जब भी घर आते हैं हम
डाल कर बाहें गले में सर को सहलाती है माँ
ऐसा लगता है जैसे आ गए फ़िरदौस में
खींच कर बाहों में जब सीने से लिपटाती है माँ
देर हो जाती है घर आने में अक्सर जब कभी
रेत पर मछली हो जैसे ऐसे घबराती है माँ
शुक्र हो ही नही सकता कभी उसका अदा
मरते मरते भी दुआ जीने की दिये जाती है माँ
( शाएरा = समीरा सुल्ताना )
तब कहीं जाकर थोड़ा सुकूं पाती है माँ
रूह के रिश्तों की यह गहराइयां तो देखिये
चोट लगती है हमारे और चिल्लाती है माँ
प्यार कहते हैं किसे और मामता क्या चीज़ है?
कोई उन बच्चों से पूछे जिनकी मर जाती है माँ
जिंदगानी के सफ़र में , गर्दिशों की धूप में
जब कोई साया नही मिलता तो याद आती है माँ
कब ज़रूरत हो मेरी बच्चे को , इतना सोच कर
जागती रहती हैं आँखें और सो जाती है माँ
भूक से मजबूर हो कर मेहमां के सामने
मांगते हैं बच्चे जब रोटी तो शर्माती है माँ
जब खिलोने को मचलता है कोई गोर्बत का फूल
आंसूओं के साज़ पर बच्चे को बहलाती है माँ
लौट कर वापस सफ़र से जब भी घर आते हैं हम
डाल कर बाहें गले में सर को सहलाती है माँ
ऐसा लगता है जैसे आ गए फ़िरदौस में
खींच कर बाहों में जब सीने से लिपटाती है माँ
देर हो जाती है घर आने में अक्सर जब कभी
रेत पर मछली हो जैसे ऐसे घबराती है माँ
शुक्र हो ही नही सकता कभी उसका अदा
मरते मरते भी दुआ जीने की दिये जाती है माँ
( शाएरा = समीरा सुल्ताना )
शनिवार, 18 अक्टूबर 2008
आज की dictionary
शराफ़त = एक ऐनक जिसे अंधे लगाते हैं
बहादुर = आग को पानी समझ कर पी जाने वाला कम इल्म
नेकी = जिसे पहले ज़माने में लोग दर्या में दाल देते थे आजकल मंडी में for sale कह कर बेच देते हैं
सच्चाई = एक चोर जो डर के मारे बाहर नही निकलता
झूट = एक फल जो देखने में हसीं है खाने में लज़ीज़ है लेकिन जिसे हज़म करना मुश्किल है
बहादुर = आग को पानी समझ कर पी जाने वाला कम इल्म
नेकी = जिसे पहले ज़माने में लोग दर्या में दाल देते थे आजकल मंडी में for sale कह कर बेच देते हैं
सच्चाई = एक चोर जो डर के मारे बाहर नही निकलता
झूट = एक फल जो देखने में हसीं है खाने में लज़ीज़ है लेकिन जिसे हज़म करना मुश्किल है
गुरुवार, 16 अक्टूबर 2008
वह क़त्ल भी करते हैं तो चर्चा नही होता
बी बी सी - हिन्दी ने यहाँ एक ख़बर दी है के आंध्र प्रदेश के आदिलाबाद ज़िले के एक गाँव में कुछ अज्ञात लोगों ने एक ही घर के छह लोगों को ज़िंदा जला दिया.

हमारा मानना है के दहशत-गर्दी का कोई मज़हब नही होता. हर मज़हब में बे-वजह का क़त्ल एक बहुत बड़ा जुर्म है. क़ुरान शरीफ़ में तो साफ़ लिखा है के :
जिस ने एक इंसान को क़त्ल किया उसने सारी इंसानियत को क़त्ल किया !
लेकिन बड़ा दुःख इस बात का होता है के हमारे हिन्दुस्तानी media को ........
नानो कार और गुजरात याद रहता है
अमिताभ बच्चन की बीमारी बड़ा परेशान करती है
राखी सावंत के आंसू दिखायी ज़रूर देते हैं
एक मासूम बच्चे को बोर-वेल से निकालने की रन्निंग कमेंट्री देना याद रहता है
बस याद नही रहता तो .....................
क्या कीजिये साहेब, किस से शिकवा कीजिये? खून-ऐ-मुस्लिम इतना ही सस्ता है आज के भारत में .....
हम आह भी करते हैं तो हो जाते हैं बदनाम
वह क़त्ल भी करते हैं तो चर्चा नही होता !!

हमारा मानना है के दहशत-गर्दी का कोई मज़हब नही होता. हर मज़हब में बे-वजह का क़त्ल एक बहुत बड़ा जुर्म है. क़ुरान शरीफ़ में तो साफ़ लिखा है के :
जिस ने एक इंसान को क़त्ल किया उसने सारी इंसानियत को क़त्ल किया !
लेकिन बड़ा दुःख इस बात का होता है के हमारे हिन्दुस्तानी media को ........
नानो कार और गुजरात याद रहता है
अमिताभ बच्चन की बीमारी बड़ा परेशान करती है
राखी सावंत के आंसू दिखायी ज़रूर देते हैं
एक मासूम बच्चे को बोर-वेल से निकालने की रन्निंग कमेंट्री देना याद रहता है
बस याद नही रहता तो .....................
क्या कीजिये साहेब, किस से शिकवा कीजिये? खून-ऐ-मुस्लिम इतना ही सस्ता है आज के भारत में .....
हम आह भी करते हैं तो हो जाते हैं बदनाम
वह क़त्ल भी करते हैं तो चर्चा नही होता !!
गुरुवार, 2 अक्टूबर 2008
ईद-उल-फ़ित्र मुबारक !!
अस्सलाम-ओ-अलैकुम
तमाम ब्लॉगर साथियों और दोस्तों को ईद-उल-फ़ित्र की पुर-खुलूस मुबारकबाद क़ुबूल हो.


तमाम ब्लॉगर साथियों और दोस्तों को ईद-उल-फ़ित्र की पुर-खुलूस मुबारकबाद क़ुबूल हो.

महफ़िलें यूँ तो रोज़ सजती हैं
महफ़िल-ऐ-ईद तेरी बात है और
महफ़िल-ऐ-ईद तेरी बात है और

हर तरफ़ गुल खिलें मसर्रत के
आप आयें तो ईद हो जाए
ईद आई है कई रंग जुलू में ले कर
इन में एक रंग तेरी याद का भी है अए दोस्त
आप आयें तो ईद हो जाए
ईद आई है कई रंग जुलू में ले कर
इन में एक रंग तेरी याद का भी है अए दोस्त
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